काबा शरीफ़ को सलाम
तवाफ़ की नमाज़ और ज़मज़म का पानी पीने के बाद अब आप सफ़ा पहाड़ी की ओर बढ़ रहे हैं। सई की इबादत यहीं से शुरू करेंगे।
सफ़ा पहुँचकर काबा शरीफ़ की ओर रुख़ करें और “बिस्मिल्लाहि अल्लाहु अकबर” कहकर सलाम करें। फिर सूरह अल-बक़रा की आयत 158 पढ़ें।
इस क़दम को जल्दबाज़ी में पूरा न करें। भीड़ में सुकून से चलें, इबादत का एहसास बनाए रखें और अगले क़दम, यानी नीयत, के लिए तैयार हों।
- दुआ
اِنَّ الصَّفَا وَالْمَرْوَةَ مِنْ شَعَٓائِرِ اللّٰهِۚ فَمَنْ حَجَّ الْبَيْتَ اَوِ اعْتَمَرَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِ اَنْ يَطَّوَّفَ بِهِمَاۜ وَمَنْ تَطَوَّعَ خَيْراًۙ فَاِنَّ اللّٰهَ شَاكِرٌ عَل۪يمٌ
- उच्चारण
इन्नस्सफ़ा वल मरवता मिन शआइरिल्लाह। फ़मन हज्जल बैता अविअतमरा फ़ला जुनाहा अलैहि अं यत्तव्वफ़ा बिहिमा। व मन ततव्वअ ख़ैरन फ़इन्नल्लाहा शाकिरुन अलीम।
- अर्थ
बेशक सफ़ा और मरवा अल्लाह के (उसके दीन के) निशानों में से हैं। इसलिए जो कोई हज और उमराह की नीयत से काबा की ज़ियारत करे और उन दोनों का भी तवाफ़ करे, तो इसमें कोई गुनाह नहीं है। और जो कोई दिल की ख़ुशी से कोई नेक काम करे, तो बेशक अल्लाह उसे जानता है और उसका बदला देता है।


